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    Home»राज्य»मध्यप्रदेश»मप्र भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग
    मध्यप्रदेश

    मप्र भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग

    News DeskBy News DeskJanuary 11, 2025No Comments5 Mins Read
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    मप्र भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग
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    भोपाल। मप्र भाजपा के जिला अध्यक्षों के चुनाव की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है। भाजपा की पहली सूची में 50 प्रतिशत से ज्यादा जिलों के अध्यक्ष घोषित हो जाएंगे। इसके फौरन बाद प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। भाजपा सूत्रों का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति में पार्टी सोशल इंजीनियरिंग पर फोकस करेगी। यानी जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन किया जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष के दावेदारों में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, सिंधी, आदिवासी वर्ग के कई दिग्गज शामिल हैं। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा को करीब 4 साल 10 महीने हो चुके हैं। उनका कार्यकाल एक बार बढ़ाया गया था। प्रदेश में मौजूदा स्थिति में सीएम डॉ. मोहन यादव ओबीसी वर्ग से हैं, जबकि दोनों डिप्टी सीएम में से राजेंद्र शुक्ल ब्राह्मण और जगदीश देवड़ा एससी से आते हैं। प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा सामान्य से हैं। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग बनाने एससी पर पार्टी दांव खेल सकती है। गौरतलब है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के दावेदारों में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा तीसरा कार्यकाल पाने के लिए प्रयासरत हैं। वहीं, जातिगत समीकरणों में ब्राह्मण वर्ग से नरोत्तम मिश्रा, राजेंद्र शुक्ल और अर्चना चिटनीस पूरी ताकत लगा रहे हैं। क्षत्रिय वर्ग की बात करें तो अरविंद भदौरिया के साथ बृजेंद्र प्रताप सिंह और सीमा सिंह जादौन सबको साधने में लगे हैं। वैश्य वर्ग से हेमंत खंडेलवाल, सिंधी समाज से भगवानदास सबनानी से लेकर दलित और आदिवासी वर्ग फग्गन सिंह कुलस्ते, सुमेरसिंह सोलंकी के नेता भी प्रदेशाध्यक्ष बनना चाहते हैं।

    15 तक होना है नए अध्यक्ष का चयन
    मप्र भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर कयासों का दौर तेज हो गया है। मप्र से छत्तीसगढ़ के विभाजन के बाद 24 वर्षों में अब तक आदिवासी वर्ग के हाथ प्रदेश की बागडोर नहीं मिल सकी। जबकि इस दौरान अनुसूचित जाति के सत्यनारायण जटिया नौ माह के लिए मनोनीत अध्यक्ष बने थे। वहीं साल 1980 से ब्राह्मण सबसे ज्यादा 6 और क्षत्रिय 5 बार प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस बीच बदलते पॉलिटिकल ट्रेंड में भाजपा जातिगत समीकरण साधने आदिवासी समुदाय की ओर भी जा सकती है। बता दें 15 जनवरी तक नए अध्यक्ष का चयन होना है। इसके लिए प्रदेश चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान जल्द ही भोपाल का दौरा कर सकते हैं। प्रदेश की कमान संभालने में जातीय आधार पर पार्टी में ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्ग का वर्चस्व रहा है। अनुसूचित जाति के सत्यनारायण जटिया को सिर्फ नौ माह के लिए अध्यक्ष मनोनीत किया गया। जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने। तब प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर 27 फरवरी 2006 को पार्टी ने जटिया को प्रदेश अध्यक्ष के लिए मनोनीत किया। लेकिन नौ महीने बाद 21 नवंबर 2006 तक ही वो अध्यक्ष रहे। उनके बाद फिर क्षत्रिय समुदाय के नरेंद्र सिंह तोमर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

    कुलस्ते और सोलंकी चर्चा में
    नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए आदिवासी वर्ग से दो नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं। सात बार के सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते इस दौड़ में सबसे आगे हैं। वे केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव लडऩे का मौका दिया। केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से उनकी संभावना प्रबल है। वहीं राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी युवा और ऊर्जावान चेहरा हैं। मालवा के सोलंकी संघ के नजदीकी हैं। आदिवासी समाज में उनकी अच्छी पकड़ है। गजेंद्र सिंह पटेल और महिला नेताओं में हिमाद्री सिंह का नाम भी चर्चाओं में है। हालांकि इनकी संभावनाएं प्राथमिक नामों की तुलना में थोड़ी कमजोर मानी जा रही हैं। भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में आदिवासी वोटबैंक को साधने के लिए विशेष प्रयास किए थे। 230 सीटों में से 47 आदिवासी सीटों पर पार्टी ने 24 सीटें जीती थीं। हालांकि यह प्रदर्शन भाजपा के कुल 163 सीटों की तुलना में कमजोर था। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने एसटी वर्ग की सुरक्षित सीटों पर 50त्न से अधिक वोट हासिल किए थे। बता दें प्रदेश में करीब 24 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। जिसमें करीब 16 प्रतिशत आबादी दलित समुदाय की है। ऐसे में इस बार भी आदिवासी वोटों को साधने के लिए भाजपा खास रणनीति बना रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनजातीय गौरव दिवस के रूप में बिरसा मुंडा जयंती मनाना और मध्यप्रदेश में जनजातीय संग्रहालयों का उद्घाटन इस दिशा में बड़े कदम माने जा सकते हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए किसी आदिवासी नेता को मौका देने की मांग को पूरा कर भाजपा बड़ा सियासी दांव खेल सकती है।

    इस तरह होगा प्रदेशाध्यक्ष का चुनाव
    प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के लिए प्रदेश परिषद के सदस्यों की राय ली जाएगी। इसके लिए प्रदेश परिषद के सदस्यों का चयन किया जाएगा। इसमें सभी विधानसभाओं से एक-एक प्रदेश परिषद सदस्य प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में हिस्सा लेगा। हर जिले में दो-दो विधानसभाओं का एक कलस्टर बनाया जाएगा। अगर किसी जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं या फिर कहीं 5 विधानसभा सीटें हैं तो अतिरिक्त एक विधानसभा को भी क्लस्टर मानकर प्रदेश परिषद का एक सदस्य बनाया जाएगा। सिंगल विधानसभा के क्लस्टर से महिला, एससी-एसटी वर्ग के नेता को प्रदेश परिषद का सदस्य बनाया जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया होने तक जितने जिलाध्यक्ष घोषित हो चुके हैं वे भी प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में भाग लेंगे। प्रदेश में भाजपा के विधायकों और सांसदों में से 10-10 प्रतिशत विधायक और सांसदों को प्रदेश परिषद का सदस्य बनाया जाएगा। यानी भजापा के 165 विधायकों में से 16 विधायक और 29 लोकसभा सांसदों में से 3 सांसद प्रदेश अध्यक्ष के निर्वाचक मंडल में शामिल होंगे। जितने भी प्रदेश परिषद के सदस्य बनेंगे, उन्हें प्रदेशाध्यक्ष के चुनाव का निर्वाचक मंडल माना जाएगा। चुनाव प्रक्रिया की तारीखें केंद्रीय नेतृत्व की ओर से तय की जाएंगी। एक दिन रायशुमारी और अगले दिन नामांकन के साथ ही नाम वापसी, दावे-आपत्ति और चुनाव परिणाम के लिए समय तय किया जाएगा। इसी दिन प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा होगी।

    News Desk

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